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कहा जाता है की शनि देव ऐसे भगवान है जो हर किसी के ग्रह में एक बार अवश्य आते हैं। कभी वो उसके ग्रह में 7 साल रहते है तो कभी अढाई साल पर एक बार जरुर आते हैं। शनि देव जब भी आते है हर किसी को उनके कर्मो के फल देते हैं। शनि देव को कर्मफलदाता कहा जाता है। शनि देव हमेशा अपने भक्तो पर दया भावना रखते हैं, पर यदि किसी के कर्मो में कुछ गलत होता है तो उसका फल भी शनि देव देते हैं। शनि देव अपने भक्तों पर दया करते है जो उनकी सच्चे मन से भक्ति करता हैं। शनि देव उन्हें मालामाल कर देते हैं। आज हम आपको शनि देव की वो कहानी बताने जा रहे है, यदि कोई व्यक्ति इस कहानी को सुनता है और समझता है और शनि व्रत करता है तो शनि देव उसे कभी भी दुःख की अनुभति नहीं होने देते हैं।

शनि देव की कहानी – एक समय में स्वर्गलोक में सबसे बड़ा कौन के प्रश्न पर नौ ग्रहों में वाद-विवाद हो गया। निर्णय के लिए सभी देवता देवराज इन्द्र के पास पहुंचे और बोले- हे देवराज, आपको निर्णय करना होगा कि हममें से सबसे बड़ा कौन है? देवताओं का प्रश्न सुन इन्द्र उलझन में पड़ गए, फिर उन्होंने सभी को पृथ्वीलोक में राजा विक्रमादित्य के पास चलने का सुझाव दिया।1

सभी ग्रह भू-लोक राजा विक्रमादित्य के दरबार में पहुंचे। जब ग्रहों ने अपना प्रश्न राजा विक्रमादित्य से पूछा तो वह भी कुछ देर के लिए परेशान हो उठे क्योंकि सभी ग्रह अपनी-अपनी शक्तियों के कारण महान थे। किसी को भी छोटा या बड़ा कह देने से उनके क्रोध के प्रकोप से भयंकर हानि पहुंच सकती थी।

अचानक राजा विक्रमादित्य को एक उपाय सूझा और उन्होंने विभिन्न धातुओं जैसे सोना, चांदी, कांसा, तांबा, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक व लोहे के नौ आसन बनवाएं। सबसे आगे सोना और सबसे पीछे लोहे का आसन रखा गया। उन्होंने सभी देवताओं को अपने-अपने आसन पर बैठने को कहा। उन्होंने कहा- जो जिसका आसन हो ग्रहण करें, जिसका आसन पहले होगा वह सबसे बड़ा तथा जिसका बाद में होगा वह सबसे छोटा होगा।